Monday, February 9, 2015

आम आदमी पार्टी को बहुमत या मुफ्तमत

जब आम आदमी पार्टी ने राजनीति में शुरुआत की तो सभी को चौंका दिया था कि अभी कल की आई पार्टी दिल्ली में कैसे 28 सीटों पर अपना कब्ज़ा जमा सकती है , यह कांग्रेस विरोधी लहर का एक नमूना था और इसके बाद लोकसभा चुनावों में भी आम आदमी पार्टी ने 4 सीटों के साथ अच्छी शुरुआत की |
यह दिल्ली विधानसभा 2015 का चुनाव था और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की एक सफल सरकार चल रही थी और दिल्ली छोड़कर और सभी जगहों पर सबको अनुमान था कि जिस प्रकार लोकसभा और उसके बाद कई राज्यों में विधानसभा चुनावों में मोदी लहर का फायदा मिला था वो इस बार भी मिलेगा और दिल्ली चुनाव में भाजपा की भारी मतों से जीत अगर नहीं भी होगी तो जीत तो होगी ही, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और दिल्ली लोकल जीत गयी |
आम आदमी पार्टी के काम करने के तरीके पर विचार करें तो यह पार्टी एक आन्दोलन के दत्तक पुत्र के रूप में देश को परोसी गयी, जिस प्रकार से मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, शायद यादव, राम विलास पासवान जैसे नेता जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन की उपज थे | और कालांतर में इनकी पार्टियाँ लोगों को विकास के रास्ते पर ले जाने और जनता को मजबूत करने के बजाय उसे अपने ऊपर आश्रित करने और मुफ्तखोर बनाने का प्रयास किया है | आम आदमी पार्टी ने यह सीख भलीभांति इन क्षेत्रीय दलों से ली कि अगर चुनाव जीतना है तो लोगों को मुफ्त बांटने और मुफ्त सामानों के वादे करो क्योंकि हर व्यक्ति अपने फायदे के लिए वोट देता है न कि देश के लिए | 
पूरे देश से आये आयकर का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ दिल्ली और मुंबई में खर्च हो जाता है, हालांकि मुंबई सबसे ज्यादा आयकर देने वाला शहर भी है | क्या दिल्ली के लोगों ने पूरे देश से आ रहे धन और स्नेह का यह सही सिला दिया है आम आदमी पार्टी को जिताकर यह तो अभी बाद में ही पता चलेगा लेकिन इतना तो जरुर होगा कि आम आदमी पार्टी आगे चलकर अपने 70 के 70 वादों के पूरा न होने पर केंद्र को घेरने का प्रयास करेगी कि वो हमें समर्थन नहीं दे रहे हैं, वैसे वादे तो अपने दम पर ही किये जाने चाहिए किसी के भरोसे नहीं |
दिल्ली की जनता ने दिल्ली को एक बहुमत की सरकार दी यह एक अच्छी बात है लेकिन सिर्फ मुफ्त के लिए, सिर्फ 200 लीटर मुफ्त पानी और चिल्लर यूनिट बिजली अगर दिल्ली जैसी पढ़ी लिखी जनता को बहका सकती है तो अगर देश का वोट 100 रुपये में बिकता हो तो गलत क्या है ??
जब देश की राजधानी के लोग ही मुफ्त की चीजों में विश्वास रखते हों तो उत्तर प्रदेश अगर फ्री लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ता के लिए वोट देता है तो गलत क्या है ??
आम आदमी पार्टी को बहुमत के लिए साधुवाद और उम्मीद करते हैं कि आम आदमी पार्टी जनता के लिए काम करेगी न कि धरने के लिए |

आल इंडिया बकवास शो


एआईबी ने के एक नॉकआउट राउंड किया लगभग एक घंटे का और इसे यूट्यूब पर धड़ल्ले से दिखा भी रहे हैं | मैंने कई लोगों के ट्विटर और फेसबुक पर इसकी बड़ाई सुनकर मैंने भी देखने का प्रयास किया लेकिन मुझे इसमें उस फूहड़ता की झलक दिखी जो इनके जैसे लोगों के अन्दर नहीं होनी चाहिए थी | अपनी माँ के सामने कारन जौहर जिस प्रकार के अश्लील हरकतों को अंजाम दे रहे थे और बातों में कहीं भी नैतिकता थी ही नहीं, मुझे नहीं लगता कि उनके परिवार में कभी भी किसी प्रकार के नैतिक आचरण का माहौल रहा होगा |

अलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा, दीपिका पादुकोण और भी अन्य गणमान्य कलाकार जैसे लोग जिन्हें महिलाओं के साथ हो रहे दुष्कर्म पर तुरंत मिर्ची लग जाती है वो लोग इस अश्लील कार्यक्रम का ख़ुशी से हिस्सा बन रहे थे | पता नहीं कितनी लडकिय इन्हें इनकी मेहनत के लिए अपना आदर्श मानती हैं और इनकी हरकतें ऐसी कि इन्हें कोई शरीफ व्यक्ति अपने घर में बाई भी न रखे |
अर्जुन कपूर और रणवीर सिंह सरीखे बेहतरीन कलाकार भी इस कार्यक्रम का हिस्सा होते हुए गर्व महसूस कर रहे थे | तर्क यह था कि इस पूरे बकवास कार्यक्रम से इन लोगों ने जो पैसे कमाए हैं उसमे से चालीस लाख रूपए दान दिए हैं | क्या जिनकी एक फिल्म की फीस करोड़ों में होती हो उन्हें लाखों में दान करने के लिए किसी शो को करने की आवश्यकता पड़नी चाहिए ?? और वो भी ऐसा शो जिसे किसी सभ्य समाज में देखा ही न जा सके |
कुछ चीजें बहुत ही व्यक्तिगत होती हैं, मेरा यह भी मानना है कि बहुत घनिष्ठ मित्र आपस में गाली गलौच से बात करते रहते हैं लेकिन इनका भी एक दायरा होता है, सार्वजनिक नहीं होता | 
और इसके बाद दर्शकों की बात करें तो इसकी वाहवाही करने वाले दर्शक वही हैं जिन्हें चीप मेंटालिटी वाले लोग नहीं पसंद हैं, जिन्होंने आँखों पर आधुनिकता के चश्मे पहने हुए हैं | ये वही हैं जो एक रेप होने पर मोमबत्ती लेकर बैठ जाते हैं क्योंकि मीडिया उसे ठीक से दिखाता है और अपने बगल वाले घर में ही किसी पीड़ित महिला या लड़की की मदद नहीं करने जाते क्योंकि ये दुसरे घर का मामला होता है |
अपील बस इतनी है कि आपसे उम्मीद अच्छे की होती है इसलिए दुःख होता है आपके दुष्कर्मों पर | आगे से ऐसा न हो इसकी मात्र फिर से उम्मीद ही कर सकते हैं |

Sunday, February 8, 2015

दिल्ली चुनावों का हाल

ये देश की राजधानी का चुनाव है, ये दिल्ली का चुनाव है | देश की आर्थिक राजधानी तो मुंबई है और आधुनिक भी लेकिन दिल्ली को जागरूक राज्य के रूप में जाना जाता है |

देश में कहीं भी कुछ भी हो सबसे पहले मोमबत्ती दिल्ली में ही जलती है, आखिर दिल्ली में देश का दिल जो बसता है | लोकसभा चुनावों में एक अलग सरगर्मी थी और एक अलग ही तरह की आंधीनुमा बयार थी जिसमे कई काबिल बह भी गए और कई नाकाबिल बस भी गए | लोकसभा चुनावों के सामने दिल्ली का चुनाव कोई मायने नहीं रखना चाहिए लेकिन हुआ इस से बिलकुल उलट |

दिल्ली चुनावों की जलेबी बनाने के लिए सभी मीडिया घराने, समाजसेवी, देश भर के राजनेता और तमाम ऐसी पार्टियाँ जिनका इन चुनावों में रत्ती भर भी असर नहीं वो भी काफी सक्रिय दिखीं | ये लड़ाई ऐसी थी कि भाजपा बनाब “आल” आदमी पार्टी हो चूका था |

भारतीय जनता पार्टी को शुरू से ही लग रहा था कि इस बार यह लड़ाई सिर्फ कहने के लिए हैं और नतीजे तो पहले से ही तय है, और आम आदमी पार्टी ने इसे अपनी करो या मरो कि लडाई बनाकर भाजपा को मुश्किल में ला दिया | लेकिन जैसे जैसे चुनाव करीब आते गए तो भाजपा आलाकमान को समझ आ गया कि कोई चेहरा तो देना ही होगा | भाजपा ने अपने कर्मठ, जुझारू वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शन मंडल में रखकर केजरीवाल की पूर्व सहयोगी किरण बेदी का पार्टी में मुखौटे के रूप में आयात किया और पार्टी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार दिया |

भाजपा अपने इस दांव को काफी हल्का समझ रही थी लेकिन यह दांव आम आदमी पार्टी के ऊपर भारी पड़ गया और आम आदमी पार्टी अपनी “भगोड़े” छवि से बाहर आने में सफल होती नहीं दिखी, बावजूद इसके तमाम टीवी चैनलों ने क्रन्तिकारी ढंग से आम आदमी पार्टी की तरफदारी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी | इसके बाद भी आम आदमी पार्टी अकेली ऐसे पार्टी रही जिसने प्रतिदिन मजदूरी पर कार्यकर्ताओं को बटोरा और प्रचार कराया और वहीँ भाजपा के कार्यकर्ता बेदी तो नहीं लेकिन मोदी के नाम वोट मांगते गली गली नजर आये और कांग्रेस के लाइफटाइम सिम कार्ड जैसे वाले कार्यकर्ता वफादारी से अपना काम सिर्फ चुनाव के दिन बूथ एजेंट के रूप में करते दिखे |

इन सब में ख़ास बात यह रही कि इस बार मतदान के लिए किसी को जागरूक करने की आवश्यकता नहीं पड़ी | चाहे वो कोई भाजपा को वोट दे रहा हो या किसी आशा के साथ आआपा को या फिर अपनी निष्ठां वो कांग्रेस में दिखा रहा हो |

नतीजे क्या होंगे ये तो वक़्त बताएगा लेकिन अभी से कोई भी अनुमान लगाना बेईमानी होगी क्योंकि इस चुनाव में मतदाताओं में वास्तविकता में गुप्त मतदान किया है और निर्णय 10 फरवरी को हमारे सामने होगा |

अच्छा ! नमस्ते !!

Tuesday, December 17, 2013

राहुल गाँधी ने रखा एनिमल बिल का प्रस्ताव (व्यंग्य)

Rahul Gandhi's Animal Bill:
आख़िरकार राहुल गाँधी ने अपनी माँ और कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गाँधी के सामने एक समझदारी भरा प्रस्ताव रख ही दिया, राहुल गांधी ने एनिमल बिल का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि अब देश की इंसानी जनता की हमारी पार्टी में कोई रूचि नहीं है तो क्यों न हम बन्दर प्रजाति को ही समाज की मुख्य धारा में शामिल कर लें और उन्हें मतदाता बनाकर प्रशिक्षित करें और इस से हिन्दुओं के बीच भी  हमें समर्थन प्राप्त होगा क्योंकि उनके भगवान श्री हनुमान जी हैं और बन्दर उनकी सेना |


वहीँ मुलायम सिंह यादव ने सूअरों का प्रस्ताव आगे किया और मायावती ने कहा कि भैंस को आरक्षण मिलना चाहिए |
दिग्विजय सिंह ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सोनिया जी सिर्फ राहुल जी नहीं मेरी भी मम्मी हैं तो मेरी बात भी सुनी जानी चाहिए और मेरी प्रजाति के लोगों को मुख्य धारा में शामिल करना चाहिए क्योंकि वो ही सबसे वफादार माने जाते हैं |

चुनाव आयोग ने पहले से ही योजना बनाने के लिए गाय, भैंस, बन्दर, कुत्ता और सभी प्रजातियों के जानवरों के पास एक पत्र भेजा है जिसमे बहुमत से हर प्रजाति से एक प्रतिनिधि चुनने का निर्देश दिया गया है |

यह बात और गंभीर हो गयी जब जंगल के राजा बब्बर शेर ने फ़तवा जारी करके कहा कि अगर कोई भी जानवर इन काफिर इंसानों के समूह का हिस्सा बनने जाता है तो उसे अछूत मान लिया जाएगा क्योंकि ये सब अपने समाज नहीं बल्कि सिर्फ पैसों से मतलब रखते हैं और जो आमंत्रण हमें भेजा गया है उसमे भी इनका अपना स्वार्थ है |

कुत्ता सिंह ने कहा कि मैं जब फेसबुक देखता हूँ तो लोग दिग्विजय सिंह की तुलना मुझसे करके मेरी बेज्जती करते हैं मैं इसके खिलाफ कुत्ता समाज हित के लिए एक याचिका दायर करना चाहता हूँ |
इस मामले को जल्दी ही संसद में उठाये जाने की बात भी चल रही है और अरविन्द केजरीवाल ने गधे का प्रस्ताव रखकर कहा है कि अगर गधे को मुख्य धारा में लाया जाएगा हम तभी सरकार बनायेंगे |

देखिये आगे क्या होता है .. लेकिन एक बात तो साफ़ है कि दोनों ही पक्ष अपने वसूलों के पक्के हैं |

Thursday, December 5, 2013

क्या हम जिम्मेदार हैं ... ??

हम अक्सर जिम्मेदारियों की बात करते हैं, आखिर जिम्मेदार कौन है ?
सड़क के लिए जिम्मेदार कौन है?
पानी के लिए जिम्मेदार कौन है ?
चाय में कम चीनी के लिए जिम्मेदार कौन है ?
भारत के मैच हारने का जिम्मेदार कौन है ?
गाड़ी का एक्सीडेंट होने का जिम्मेदार कौन है ?
और आपका चश्मा टूटने का जिम्मेदार कौन है ?.... ऐसी हज़ारों जिम्मेदारियों का जिम्मा हमारे अलावा और पूरी दुनिया ने लिया होता है .. सामान्यतः हम किसी भी चीज के जिम्मेदार नहीं होते .. क्यूंकि सिर्फ जब कुछ बेहतर हुआ हो तो हम जिम्मेदार हो सकते हैं लेकिन अगर गलत है तो हम जिम्मेदार हो ही नहीं सकते .
क्यों..?
क्योंकि हम कह रहे हैं .. जानते नहीं हो हमें .. ?

इस समय बात कर रहा हूँ नेताओं के सन्दर्भ में .. जब भी कोई भी समस्या हमारे समाज में होती है यहाँ तक कि हमें व्यक्तिगत रूप से भी कोई समस्या होती है तो अधिकतर बार वह बात यहीं आकर समाप्त होती है कि नेता जिम्मेदार है ... 

अगर किसी व्यक्ति ने कई वर्ष काम करते हुए नेता गया, या लोग उसे नेता कहने लगे तो वह अकेला जिम्मेदार पुरे समाज का हो जाता है .. उस से उम्मीदें ऐसी की जाती हैं जैसे किसी राजशाही खानदान का राजकुमार हो वह नेता .. 
किसी को भी अगर वह एक अच्छा विद्यार्थी है तो 3-4 या अधिकतम 5 वर्ष लगते हैं आईएएस या आईपीएस कि परीक्षा उत्तीर्ण होने में लेकिन एक साधारण व्यक्ति को नेता बनने में 24 घंटे काम करते हुए बीसों साल लग जाते हैं और तब भी कोई गारंटी नहीं होती है कि वह नेता बना रहेगा.. उसे कभी भी गद्दी छोडनी पड़ सकती हैं .. और वह गद्दी पर है चाहे नीचे .. उसे जनता की सभी उम्मीदों पर खरा उतरना पड़ता है .. ऐसा नहीं होता जैसे कोई अर्दली आकर कह देता है कि डीएम साहब आज छुटटी पर हैं तो कोई उन्हें परेशान नहीं करेगा | नेता को कभी भी कोई भी कहीं भी बुला सकता है .. नाली टूटने से लेकर पुल टूटने तक .. और क्लर्क से लेकर डीएम तक के काम न करने की वजह भी कहीं नहीं कहीं नेता को ही मान लिया जाता है .. 

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या अगर हम नेता को बुरा कहने में संकोच नहीं करते और उसे लगातार लगभग हर परेशानियों और दिक्कतों के लिए जिम्मेदार ठहरा देते हैं तो क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या हमारा इस लोकतंत्र, इस समाज में कोई योगदान नहीं है ..? हम अपनी जिम्मेदारी को ठीक से निभा नहीं सकते या हमें सिर्फ बोलना आता है, खाना आता आता है चिल्लाना आता है लेकिन कुछ करना नहीं आता ...?? 

जब हम किसी नेता के कद की बात करते हैं तो सबसे पहले आर्थिक आकलन करते हैं, चारपहियों का आकलन करते हैं, उसके जेब में पैसे की बात करते हैं .. 

कोई भी व्यक्ति कोई कार्यक्रम का आयोजन करता है तो उसी नेता को बुलाता है जो उसे कुछ आर्थिक मदद कर सकता है .. या उसी नेता के साथ खड़ा होता है जिस से उसे कुछ आर्थिक मदद मिलती हो .. जो किसी नेता के साथ एसी गाड़ियों में घूमने को पाता है वही नेता अच्छा होता है ..

हम नेताओं का आकलन उनके व्यक्तित्व और काम करने की इच्छाशक्ति से नहीं बल्कि बल्कि उसी भौतिक सम्पन्नता से करते हैं तो हम नेताओं से उम्मीद ही क्यों रखते हैं कि वो कुछ बेहतर करेंगे ... वोट उसको पड़ता है जो पैसे बांटता है ... तो काम भी तो उसी का होगा जो पैसे देगा .. 

कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी ... नेता उसको मानिये जो आपके सुख दुःख में आपके साथ खड़ा हो .. ऐसा नहीं कि सिर्फ आपको कुछ आर्थिक या भौतिक लाभ पहुंचाए .. दरअसल जब हम अपने व्यक्तिगत लाभों को एक किनारे करके समाजहित के लिए उपयुक्त नेता ढूँढने लगेंगे तो विकल्प आस पास ही मिल सकते हैं .. जरुरत है आर्थिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकलने की ... 

और जब इस तरह का माहौल हम दे पाने में कामयाब होंगे तो शायद निम्न वर्ग के परिवारों और मध्यम वर्ग के परिवारों के युवा भी राजनीति में अपनी भागीदारी के विषय में सोच पायेंगे .. और तब ही से स्वस्थ प्रतियोगिता जैसी चीज राजनीति में भी देखने को मिल सकती है .. नहीं तो जो हो रहा है वो तो सबके सामने है ही ...

Monday, December 2, 2013

आखिर क्यों कुछ नया किया जाय ?

बहुत दिनों से कुछ नया नहीं दिखा रहा है, न कुछ नया चल रहा है न कोई नया कुछ कह रहा है .. सब कुछ ऐसा लगता है जैसे सदियों से चला आ रहा है | लगता है जैसे बदलाव न हो रहे हैं और न ही कोई गुंजाइश है, जैसे मानो बदलाव ऊर नयेपन को लकवा मार गया हो | पता नहीं कोई नया कुछ करना नहीं चाहता या कोई अब कुछ नया देखने कि इच्छा ही नहीं रखता या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि सभी को उस परम सत्य कि प्राप्ति हो गयी जिसे सुकरात भी सिर्फ खोजते ही रह गए?

एक पहलू यह है कि कोई कुछ नया करना नहीं चाहता, आखिर क्यों कुछ नया किया जाय ? "इस से हमारा फायदा क्या होगा?" क्या हमें ही गरज है नया करने की .. कोई और क्यों नहीं करता .. हम ही सबका ठेका ले लें?... क्यों सब नया करने के लिए हमारे ऊपर थोपना चाहते हो? क्या पूर्वजों ने जो कर दिया वो काफी नहीं है? .. जो सिस्टम है उसका हिस्सा बनने में ही भलाई है .. नया करोगे तो पिसोगे .. अरे भाई जरुरत ही क्या है?.. हम जो कर रहे हैं उस में हम खुश हैं हमें और नहीं चाहिए ...|

दूसरा पहलु यह भी हो सकता है कि कोई कुछ नया करवाना ही नहीं चाहता .. आखिर क्या करेंगे यह लोग नया करके .. इन लोगो का सिर्फ समय खराब होगा .. नयापन इन लोगो के लिए है ही नहीं .. कहीं कुछ नया हो गया तो सब हमारे हाथ से निकल न जाए !! .. ये लोग तब भी वैसे ही रहेंगे .. ये लोग जैसे हैं इनके लिए वही ठीक है .. क्यूँ इनका समय बर्बाद करना .. जो है उसी में काम कर लें वही बहुत है .. ये नया करेंगे तो हमारा काम कौन करेगा ???

लेकिन एक गंभीर पहलू यह भी हो सकता है कि लोगो को नया करने के लिए मौका नहीं मिल पाता .. पैसा कमायें या नया करें .. कहीं मुझे निकाल न दिया जाय .. पापा नाराज हो जायेंगे... बॉस निकाल देगा .. संसाधन नहीं हैं .. संस्थान नहीं हैं .. समय नहीं है .. समर्थन नहीं है .. मेरे लायक नहीं है .. मैं क्या करूँ ??


दरअसल मैं बात कर रहा हूँ आज के समय में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नया करने के लिए .. आज शिक्षा उसे कह रहे हैं जिसमे शायद शिक्षा का अंशमात्र भी नहीं है .. हम अपनी परंपरागत प्रणाली को दरकिनार करते हुए लगातार नौकर बनाने वाले साधनों पर बल देते हैं .. हम नियमित कक्षाओं पर नहीं क्रैश कोर्सेज पर बल दे रहे हैं .. हम शिक्षा को शोध और सोच से कहीं दूर सिर्फ शोक कि अवस्था में ले जाने के लिए तत्पर दिख रहे हैं |


हम नौकरों और नौकरशाहों की जमात कड़ी करने में लगे हैं लेकिन इस पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं कि इनके नैतिक मूल्यों के बारे में कौन सोचेगा ? इनकी कार्यपद्धति के बारे में कौन सोचेगा ? इनकी दिशा कैसे तय होगी ? हम टीवी बनाते जा रहे हैं और रिमोट भी बना रहे हैं लेकिन डिशटीवी को सन्देश देने वाले उस महान सेटलाईट को नजरअंदाज कर रहे हैं |


काम और कागज़ और भौतिक रूप में दिखने वाली चीजों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है वो सोच जो उनमे दिखती हो | और ऐसी सोच और सिद्धांतों का निर्माण होता है जब हम शोध करते हैं, चिंतन करते हैं, मनन करते हैं लेकिन हमारी व्यवस्था इसकी इजाजत नहीं दे पाती | कहने के लिए शोध पर खूब पैसे खर्च होते हैं और कई विद्यार्थी और बुद्धिजीवी लोग शोध और सोच में लगे हुए हैं लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम कहीं दिखते नहीं हैं |

अभी जल्दी ही UGC के उप चेयरमैन श्री देवराज जी ने कहा है कि हम कन्वेंशनल कोर्सेज कि जगह पर वोकेशनल कोर्सेज 10 वर्ष के भीतर ही लायेंगे | इसका मतलब तो यही है कि आप सोच को बंद करके सिर्फ नौकरी कराने के लिए शिक्षा देना चाहते हैं | आप वोकेशनल कोर्सेज ले आइये इसमें क्या दिक्कत है लेकिन कन्वेंशनल कोर्सेज की जगह लाना किसी भी रूप में सही नहीं दिखता और अगर ऐसा होता है तो भारत के लिए तो बहुत ही घातक होगा और मैकाले के सपने को हम काफी हद तक सच करने में सफल होंगे |

Friday, November 29, 2013

अंग्रेजों से लड़ना कहीं ज्यादा आसान था .......

बहुत दिनों से हम लखनऊ को कोस रहे हैं, जब से लखनऊ में रहने और पढने कि योजना पर क्रियान्वन हुआ और हम लखनऊ आये और लगभग 2 - 3 दिन बिताये तभी से कोसना शुरू कर दिए थे, क्यों कोस रहे थे यह बहुत समझ नहीं आता था और न ही हम बहुत व्यक्त कर सकते थे, लेकिन हाँ कुछ तो था जो अच्छा नहीं था, हम सहज नहीं महसूस कर रहे थे यहाँ, उर्जा की कमी दिख रही थी इस शहर में, हमेशा ऐसा लग रहा था कि कहीं हमने कोई गलती तो नहीं कर दी लखनऊ में पढाई करने का फैसला लेकर |
जबसे लखनऊ आये हैं तब से बहुत नहीं घूमे लेकिन जब जरुरत पड़ी तो लोगो ने बताया कि किताबें अमीनाबाद में मिलती हैं और बस दोपहर में मैं और मेरे मित्र योगेश हम दोनों ऑटो से अमीनाबाद कि लिए निकल पड़े, एमिटी यूनिवर्सिटी चौराहे से चिनहट से पॉलिटेक्निक से भूतनाथ से निशातगंज से लखनऊ विश्वविद्यालय होते हुए फटफटाती ऑटो हम काफी आगे बढे और एक जगह जाकर ऑटो रुका और ड्राईवर बोला "उतरो अमीनाबाद", मैंने एक दूकान के बोर्ड पर नीचे लिखा देखा 'राजा बाजार' और मैंने उस से कहा कि यह तो राजा बाजार है तो उसने कहा कि आगे अमीनाबाद है |
हम ऑटो से उतर गए और अब हम पैदल थे, जब हमने चलना शुरू किया तो वहीँ से एक मैदान की दीवार भी शुरू हो रही थी, काफी बड़ा मैदान दिख रहा था यह, लेकिन इसमें बीच - बीच में मूर्तियाँ थीं और बहुत से छुट्टा जानवर और लोग थे, मैं बहुत गौर से अपने साथ चल रही उस दीवार और और उसके अन्दर के मैदान को देख रहा था और मैं मेरे मित्र हम दोनों इस पर चर्चा करने लगे कि आखिर यह किसकी मूर्ति है और इस मैदान को इतनी बढ़िया दीवारों से घेरा क्यों गया है? हमने तय किया कि किताबें खरीदने के बाद हम इस मैदान और मूर्तियों के बारे आस पास के लोगो से पूछ लेंगे और हमें इतना दिमाग लगाने की जरुरत नहीं है |
दुकान पर पहुंचे किताबों के नाम लिए कुछ किताबें मिलीं और कुछ नहीं मिलीं, लेकिन एक बात जरुर कहना चाहूँगा कि जो हमेशा सुनते और पढ़ते आये थे कि यह नवाबों का शहर है और तहजीब का नमूना यहाँ देखने को मिलता है, ऐसा कुछ भी उस दूकान और दुकानदार के व्यवहार से नहीं लगा | 
अंततः हमने किताबों का मूल्य दिया और सबसे पहले उस अधेड़ उम्र के दुकानदार से पूछा कि आप कितने दिनों से यहाँ हैं तो जवाब दिया उन्होंने कि, "बचपन कि शुरुआत ही यहीं से हुयी है भैया, अब हमसे पूछेंगे कि हम कबसे हैं" तो मैंने तपाक से दूसरा सवाल सामने रख दिया, "यह सामने मैदान कैसा है और यह मूर्ति किसकी है?" तो उन्होंने जवाब दिया "मैं नहीं जानता भाई, कोई पार्क है ये|" 
बस यही था वो जवाब जिसे सुनकर दिमाग में अजीब सा कोलाहल हुआ और फिर सोचा कि क्यों न कुछ और लोगो से पूछा तो लोगों ने कुछ इस तरह से जवाब दिए :
"अरे भैया ! हम दूकान लगाते हैं, हमें इस से क्या मतलब?"
"नहीं जानते "
"बहुत दिन से है, हम नहीं जानते |"
"अम्बेडकर की है शायद!"
हमने तय किया कि हम खुद ही जाकर देख लेते हैं कि यह कैसा मैदान है और किसकी मूर्तियाँ हैं | अन्दर घुसने से पहले एक मोटरसाइकिलों का स्टैंड था, दीवारों पर तमाम तरह के पुराने कपडे और कूड़े फेंके हुए दिख रहे थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इस दीवार को बहुत दिनों से उपेक्षित कर दिया गया था लेकिन ऐसा सिर्फ दीवारों पर ही नहीं था, जब हम अन्दर उस विशाल गेट से होते हुए अन्दर उस बड़े मैदान में घुसे तो ऐसा लगा जैसे पियक्कड़ों के संरक्षण क्षेत्र के रूप में उस मैदान को आरक्षित किया गया था | जिस तरफ देखो उधर लोग पी कर मदहोश लेटे या बैठे हुए थे तो कोई ताश खेल रहा था, और जानवरों की स्थिति उन नशे में धुत लोगों से ज्यादा बेहतर दिख रही थी क्यूंकि वो जानवर उस मैदान में फेंके गए कूड़े करकट साफ़ कर के मैदान साफ़ ही कर रहे थे | 
आगे देखना था कि यह मूर्ति किसकी है ?
पहली मूर्ति थी हाथ में भारत का झंडा लिए हुए ऊर्जा से ओतप्रोत चेहरे पर ओज के साथ अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी की जिन्होंने वर्ष 1933 में लखनऊ की एक पार्क के चारों तरफ लगी अंग्रेजी सेना को धता बताकर पेड़ पर झंडा फहराया तो अंग्रेजों की गोली का शिकार होकर शहीद हो गए। तभी से उक्त पार्क का नाम झंडे वाला पार्क पड़ गया। यह ठीक है कि शहीद के बलिदान का कोई मूल्य नहीं होता | यह झंडेवाला पार्क ही था लेकिन यहाँ कुछ भी पार्क जैसा नहीं था | 
स्वतंत्रता प्राप्ति में झंडा आंदोलन का विशेष महत्व है। कई लोगों ने इसके अस्तित्व की लड़ाई में सीने पर गोली खाने से भी परहेज नहीं किया। फतेहपुर चौरासी क्षेत्र के ग्राम चंद्रिकाखेड़ा के युवक गुलाब सिंह लोधी ऐसे ही साहसी थे | लेकिन अब उनका साहस किसी काम का नहीं है क्यूंकि अंग्रेजों से लड़ना कहीं ज्यादा आसान था इस आजाद भारत के घाघ नेता और अधिकारियों से लड़ने से |
उनकी मूर्ति कबूतर की बीट खा रही है और कोई देखने वाला नहीं है और ऐसी ही स्थिति जो दूसरी मूर्ती है वो है युवाओं के प्रेरणास्रोत और जिसकी 150वां जन्मवर्ष हम मना रहे हैं ऐसे श्री स्वामी विवेकानंद जी कि प्रतिमा और उसकी यह स्थिति देखकर काफी दुर्भाग्य का अनुभव हुआ |
आगे और पता नहीं लखनऊ की और कैसी तस्वीरें देखने को मिलेंगी लेकिन यह तस्वीर बिलकुल भी अच्छी नहीं थी | बहुत खुश नहीं बल्कि निराशा के साथ यह लेख लिखा हूँ |


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