हर भारतीय के लिए गाय माँ होती है, अगर नहीं है तो वो भारतीय नहीं है twitter.com/BhaveshVinay/s…
— विनय वचन (Bhavesh) (@BhaveshVinay) March 11, 2013
Monday, March 11, 2013
गौ माँ
Saturday, March 2, 2013
अरे ! राजनीति नहीं भईया...
अपने देश के लोकतंत्र को जब करीब से देखता हूँ तो इसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोजने से भी नहीं पाता हूँ । ऐसे समाज को कैसे लोकतंत्र कहा जा सकता है जहा हर वह व्यक्ति जो कुछ समाज में बदलाव चाहता है और उसे संसाधनों की वजह से अपने आपको रोकना पड़ता है । कोई व्यक्ति चुनाव में खड़ा होकर बेहतर राजनीती को समाज का हिस्सा बनाना चाहता है तो सबसे पहले खर्च होने वाले करोड़ रुपये का ख्याल आता है।राजनीति की ही बात करता हूँ । कोई भी मध्यमवर्गीय व्यक्ति बहुत आसानी से चुनाव लड़ने के बारे में नहीं सोच सकता क्यूंकि सबसे पहले उसे खर्च होने वाली धनराशी का ख्याल आता है ।
एक जगह युवाओं को लेक्चरबाजी करते हुए मैंने उनको सलाह दिया की "राजनीति एक मौका है देश को एक सही व्यवस्था देने का", तो उनमे से एक नौजवान का तुरंत जवाब आया, "भईया राजनीति हमारे लिए नहीं बल्कि उनके लिए है जो चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं या फिर जिनके घर में पहले से ही कोई नेता हो"।
ख़ास बात तो यह है की देखने को मिलता है कि जो नौजवान किसी भी पार्टी या बड़े नेता के साथ कार्यकर्ता के रूप में लगे रहकर मेहनत भी करते हैं उन्हें भी कभी मौका नहीं मिल पाता और एक समय ऐसा आता है जब उन्हें भी कुछ गलत करने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है जो भी भ्रष्टाचार का एक कारण है ।
अधिकतर पार्टियाँ ऐसी हैं जहां कार्यकर्ताओं को नहीं बल्कि बाहुबलियों को मौका दिया जाता है, और जब तक ऐसा चलता रहेगा हम बदलाव की उम्मीद कैसे रख सकते हैं । जो प्रत्याशी चुनाव में खड़े होने के लिए टिकट के लिए अच्छे खासे रुपये खर्च करेगा उससे यह उम्मीद कैसे रख सकते हैं की चुनाव जीतने के बाद वो सरकारी पैसे को पूरी तरह से समाज के लिए खर्च करेगा ?
व्यवस्था कुछ ऐसी होनी चाहिए कि टिकट बंटवारा योग्यता के आधार पर हो जिसमे आर्थिक योग्यता सबसे बाद में देखी जाय, चुनाव आयोग को ऐसी कड़ी व्यवस्थाएं देनी चाहिए जिस से चुनाव प्रचार में होने वाला व्यय कम से कम हो, जिससे आम आदमी भी चुनाव में लड़ने के बारे में सोच सके ।
Thursday, February 28, 2013
नगर के डगर की तस्वीर - भाग 1
यह तस्वीर सिर्फ उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की ही नहीं बल्कि भारत के लगभग हर विकसित और विकासशील नगर की है | हर नगर में एक ऐसी बस्ती मिल जायेगी जिनका उस नगर की मुख्य धारा से कोई ख़ास ताल्लुक नहीं रहता | और इनके बच्चे इस तरह सड़क के किनारे बड़े बड़े नालों में अपनी छोटे से बचपन को ढूंढते हुए मिल जाते हैं | उन्हें जिंदगी का मतलब पानी की खाली बोतलों से लेकर और गुटखे के पैकेट तक ही मालूम है | उन्हें इस बात से मतलब नहीं होता की मैच भारत जीतेगा या इंग्लैंड और न ही इस से मतलब होता है की फिल्म कौन सी रिलीज हो रही है, वो भारत के प्रधानमंत्री के बारे में जानने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते |
छोटू को सिर्फ इतना मालूम है की पास वाली गली में अगर वो जल्दी ही नहीं गया तो इक़बाल वहां से कूड़े में से सामान निकल कर लेता जाएगा | उसे मालूम है की सुबह सुबह कौन कौन सी जगहें हैं जहां वह जाकर शराब की बोतलें पा सकता है जिसे बेच कर वो अपने घर पैसे लाएगा |
ऐसा घर जिसमे सभी को अपनी जिम्मेदारियां बाकायदा पता है | किसी को रोज अपना काम करने के लिए बताना नहीं पड़ता | माँ को अपने सबसे छोटे बच्चों के साथ रेलवे स्टेशन निपटाकर फिर मोहल्लों में भीख मांगने जाना है, बड़ी बेटी और लड़के को कूड़ा इकठ्ठा करने जाना है और बाप को शाम के समय सबका हिसाब लेना है |
इनके पास की समाजसेवी संस्थाएं इनके लिए अगर कुछ करने का प्रयास भी करें तो इन्हें लगता है की वो इनका भविष्य बिगाड़ रही हैं । अगर इनके बच्चों को शिक्षा देने की बात की जाती है तो इन्हें लगता है कि घर का एक कमाने वाला कम हो जायेगा ।
लेकिन फिर भी इस तस्वीर को बदलने की आवश्यकता है और इन्हें जो भी कोशिश हो करके समझाना होगा । इनके लिए भी योजनायें होनी चाहिए और उनपर बेहतर काम भी होना चाहिए ।
-भावेष कुमार पाण्डेय 'विनय'
छोटू को सिर्फ इतना मालूम है की पास वाली गली में अगर वो जल्दी ही नहीं गया तो इक़बाल वहां से कूड़े में से सामान निकल कर लेता जाएगा | उसे मालूम है की सुबह सुबह कौन कौन सी जगहें हैं जहां वह जाकर शराब की बोतलें पा सकता है जिसे बेच कर वो अपने घर पैसे लाएगा |
ऐसा घर जिसमे सभी को अपनी जिम्मेदारियां बाकायदा पता है | किसी को रोज अपना काम करने के लिए बताना नहीं पड़ता | माँ को अपने सबसे छोटे बच्चों के साथ रेलवे स्टेशन निपटाकर फिर मोहल्लों में भीख मांगने जाना है, बड़ी बेटी और लड़के को कूड़ा इकठ्ठा करने जाना है और बाप को शाम के समय सबका हिसाब लेना है |
इनके पास की समाजसेवी संस्थाएं इनके लिए अगर कुछ करने का प्रयास भी करें तो इन्हें लगता है की वो इनका भविष्य बिगाड़ रही हैं । अगर इनके बच्चों को शिक्षा देने की बात की जाती है तो इन्हें लगता है कि घर का एक कमाने वाला कम हो जायेगा ।
लेकिन फिर भी इस तस्वीर को बदलने की आवश्यकता है और इन्हें जो भी कोशिश हो करके समझाना होगा । इनके लिए भी योजनायें होनी चाहिए और उनपर बेहतर काम भी होना चाहिए ।
-भावेष कुमार पाण्डेय 'विनय'
Tuesday, October 30, 2012
भ्रष्ट नेता कब सुधरोगे
कभी सुबह कि चाय के वक़्त तो कभी खाते वक़्त
कभी आते हुए कभी जाते हुए,
गाली देने में कोई कोताही नहीं बरते
लेकिन कोई जवाब ही नहीं
अरे भाई गाली की भी कोई इज्जत होती है।
ऐसे ही थोड़े ही हम फ्री में गाली दे रहे हैं इतने दिन से
सब आपने जो किया है उसी के इनाम में दे रहे हैं
और आप कोई जवाब ही नहीं दे रहे हैं
कब तक ऐसे काम चलेगा?
कसम खाता हूँ कि बिना गाली दिए
पिछले दो साल से कभी नहीं सोया हूँ।
इतना रेगुलर याद करता हूँ तब भी कोई जवाब नहीं।
ऊधर अन्ना गरिया रहे हैं उधर कजरिया गरिया रहा है
कुछ तो शर्म करो, ऊपर से बोले कुछ नहीं
वफादार जरुर बदल दिए लूटने के लिए
गाली देने में जरा भी कमी नहीं किया हूँ,
मेट्रो से लेकर बस तक, घर से सड़क तक
दोस्त से परिवार तक, दुकानदार से पहलवान तक
सबसे बात करते वक़्त तुमको गाली जरुर देता हूँ
लेकिन फिर भी ऐ मेरे भ्रष्ट नेता कब सुधरोगे ...
कहीं ऐसा न हो कि कुछ और गड़बड़ हो जाए
-दिल से निकला
भावेष कुमार पाण्डेय "विनय"
Monday, October 29, 2012
इरम शर्मिला के उपवास को १२ साल
AFSPA (Armed Forces Special Power Act 1958) के बारे में मेरा बहुत गहन अध्ययन नहीं है, लेकिन इसे लेकर जिस तरीके से कुछ लोग बहुत ही तेजी से लड़ रहे हैं जो शर्मिला के समर्थक है... उस से लगता है की शायद कहीं कुछ न कुछ तो कमी है... लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त इस सरकार को शायद अभी अपने कोठारिया नोटों से भरने की फुर्सत नहीं है जो वो देश के किन्ही अन्य मुद्दों पर भी विचार कर सके...
इस अधिनियम को पूरी तरह से वैध कहना भी मेरे बस की बात नहीं है क्यूंकि इसमे कुछ ऐसे प्राविधान हैं जो मानवीयता को कहीं पीछे छोड़ जाते हैं.. लकिन यह बात भी नहीं सही लगती कि AFSPA को पूरी तरह से हटा लिया जाय... लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा कि आवश्यकता जरुर है...
इरम शर्मिला जो सन २००० से अभी तक इसी इंतज़ार में है कि सरकार से कोई आएगा जो उस से इस मुद्दे पर बात करेगा ... लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा है....
ऊंचे रसूख और प्रसिद्ध हस्तियों द्वारा किए गए अनशन तो टीवी कैमरों की चकाचौंध में चमक उठते हैं, लेकिन राष्ट्रीय मीडिया ने पिछले दस बरसों से अनशन कर रहीं इरम शर्मिला चानू की कभी सुध नहीं ली।
मणिपुर की ‘लौह महिला’ यानी आयरन लेडी के नाम से पुकारी जानेवालीं इरम पिछले दस साल से मणिपुर के कुछ हिस्सों और उत्तर-पूर्वी इलाकों में सशस्त्र सेना विशेष शक्तियां अधिनियम को समाप्त करने के लिए अनशन पर बैठी हैं। इस कानून के तहत सेना और अर्धसैनिक बलों को केवल संदेह के आधार पर गोली मारने का अधिकार है। राज्य सरकार उन्हें विटामिनों और जरूरी पोषक तत्त्वों के मिश्रण पर जीवित रखता है और दिन में दो बार जबरदस्ती उनकी नाक से उन्हें वह मिश्रण चढ़ाया जाता है।
इरम कहती हैं,“मेरे लोगों पर इस तरह का अत्याचार कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह ईश्वर की इच्छा है। मैं इसे जारी रखूंगी।”
यह अलग बात है कि मांगे कितनी सही या गलत हैं... लेकिन उनपर विचार करना और बात करना बहुत आवश्यक है... इरम के करीबी बताते हैं कि वो बस इस अधिनयम में कुछ बदलाव चाहती हैं जिस से उनपर अत्याचार न हो सके....
- आशा है कुछ अच्छा होगा....
भावेष कुमार पाण्डेय "विनय"
Sunday, October 28, 2012
कुमार विश्वास : किसी मंच लायक नहीं...
Thursday, October 25, 2012
उत्तर प्रदेश की कमान, गैरजिम्मेदार मुखिया के हाथ
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| फैजाबाद दंगे में 24 अक्टूबर को जलती यह दूकान |
जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बहुमत से आई और मायावती का तख्ता पलट कर जब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया गया तब शायद जनता में किसी को यह अंदेशा नहीं रहा होगा की वो उत्तर प्रदेश को जिस हाथ में सौंप रहे हैं है वो हाथ सुरक्षित नहीं हैं.
अखिलेश की जिस युवा छवि का हवाला देकर समाजवादी पार्टी ने जनता से वोट लिए वैसी कोई योजना आज तक अखिलेश जनता के सामने नहीं पेश कर पाए. अपनी सेक्युलर छवि को बनाये रखने वाले मुस्लिमों के मनमोहक के रूप को अपने पिता के ही पदचिन्हों पर चलते हुए उसे बनाये रखा.
उत्तर प्रदेश में नयी सरकार आने के बाद लगातार आठवाँ साम्प्रदायिक दंगा जब फैजाबाद में हुवा तो पूरा शहर दहल गया. दुर्गा पूजा में एक महिला के साथ दुर्व्यवहार से निकला यह मुद्दा एक बड़े संघर्ष में बदलता हुवा दिखने लगा. दुर्गा माता की मूर्ति विसर्जन के लिए ले जाते वक़्त किसी मनहूस ने पत्थर फेंका और मामला यही से प्रारंभ होते हुए हिन्दू मुस्लिम संघर्ष में कब तब्दील हुवा पता ही नहीं चला. दो दर्जन से ज्यादा वाहन जले , दुकानें और घर जले और कई मौतों के बाद भी यह मामला थमा नहीं. प्रसाशन ने पहले धरा 144 लगाया और फिर गुरुवार शाम तक कर्फ्यू का ऐलान हो गया.
यह पहला दंगा नहीं था :
एक जून को मथुरा के कोसीकला में पानी को लेकर मजहबी विवाद जिसे पांच लोग मरे और सोलह घायल हुए.
23 जून को एक युवती के साथ हुए दुराचार के चलते साम्प्रदायिक रूप लेते हुए दंगे में 40 घर राख हो गए.
ऐसे ही 23 जुलाई को बरेली, 17 अगस्त को असम, कानपुर, लखनऊ, और 14 सितम्बर को गाज़ियाबाद में भी हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे हुए जिनमें कई जानें गयीं, घर जले, दुकानें जलीं, कर्फ्यू लगा, लेकिन निष्कर्ष के तौर पर 24 अक्टूबर को फैजाबाद का दंगा मिला.
सेक्युलर होने का मतलब शान्ति और सौहार्द्र होता है. यह नहीं की अगर दुसरे धर्म का व्यक्ति दोषी है तो उसे सिर्फ इसलिए सजा न दी जाय क्यूंकि हमें अपनी सेक्युलर छवि बनाये रखनी है. और यह सब करते हुए अखिलेश भी अपने पिता की ही तरह दंगाइयों के संरक्षक बने रहने में कामयाब हो रहे हैं. अखिलेश कहते हैं की वो दंगा पीड़ितों को को मुआवजा देंगे. हम उनसे पूछना चाहेंगे कि आप उन लोगो को शाबाशी ह देते रहेंगे या कोई निर्णायक कदम भी उठाएंगे?
उत्तर प्रदेश कि समस्याओं के हल के लिए अखिलेश को अम्बानी के चंगुल से निकलना ही होगा. अगर ऐसा ही चलता रहा तो ये सभी संघर्ष कहीं विकराल रूप न ले लें. और मीडिया कि बात करें तो केवल दिन भर करीना सैफ, कॉमेडी शो और धरती का अंत दिखने में व्यस्त हैं. यहाँ मानवता का अंत उन्हें नहीं दिखता.
- निराश हूँ..
भावेष कुमार पाण्डेय 'विनय'
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